श्रीमती एनी वीसेन्ट || Annie Besant

विदेश की जिन महिलाओं को भारत- प्रेम ने आकर्षित किया, उनमें श्रीमती एनी वीसेन्ट का उल्लेख प्रमुखता के साथ किया जाता है। यद्यपि स्वामी विवेकानन्द के व्यक्तित्व एवं वेदान्ती दर्शन से प्रभावित होकर सिस्टर निवेदिता, महात्मा गाँधी की परम भक्त एवं अनुगामिनी मीरा बेन और कलकत्ता की दरिद्रता से द्रवित होकर भारत में बसने वाली ‘गटर की सन्त’ मदर टेरेसा हैं। फिर भी श्रीमती एनी वीसेन्ट का नाम भारत में इण्डियन नेशनल कांग्रेस, थिथोसोफिकल सोसाइटी के साथ जुड़े रहने के कारण अधिक लोकप्रिय और सम्मानित है। एनी वीसेन्ट का जन्म अक्तूबर, 1847 को लन्दन में हुआ था। परन्तु वह स्वयं को आयरलैण्डवासी कहलाना अधिक पसन्द करती थीं। उनकी माँ श्रीमती मोरिस धार्मिक विचारों की संवेदनशील महिला थीं और पिता अच्छे दर्जे के विद्वान थे। कई भाषाओं के प्रकाण्ड पण्डित थे। परन्तु पिता की छत्रछाया से शीघ्र ही वंचित हो गईं। जब वह पाँच वर्ष की थीं तब उनके पिता का देहान्त हो गया था। फिर भी उनकी माँ ने उनकी शिक्षा में किसी प्रकार का व्यवधान नहीं आने दिया। अपनी बेटी एनी की पढ़ाई की ओर ध्यान निरन्तर देती रहीं। पढ़ाई के साथ-साथ एनी प्लेटो, होमर, दाँते, मिल्टन और स्पेंसर का अध्ययन करती रहीं और उनके विचारों में प्रभावित हुई थीं।

अपने बीसवें वर्ष की आयु में एनी का विवाह पादरी फ्रैंक वीसेन्ट से हुआ। एनी आरम्भ से स्वतन्त्र विचारों की महिला थीं। ईश्वर के अस्तित्व पर थोड़ी आशंकित थीं। पादरी फ्रैंक वीसेन्ट के विश्वासानुसार एनी नास्तिक थीं। नास्तिकता और आस्किता का समन्वय होना असम्भव था। अतः सम्बन्ध विच्छेद आवश्यक हो गया। 1873 में विधिवत् पति-पत्नी पृथक् हो गए। पादरी फ्रैंक वीसेन्ट से अलग होकर एनी स्वतन्त्र हो गयीं। एक वर्ष के पश्चात् एनी की भेंट चार्ल्स ब्राडले से हो गयी। चार्ल्स वुडैला नारी के प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने श्रीमती एनी वीसेन्ट को अपनी संस्था नेशनल सेक्यूलर सोसाइटी की सदस्यता स्वीकार करने का निमन्त्रण दिया जिसे एनी वीसेन्ट से सहर्ष स्वीकार कर लिया। कुछ समय के पश्चात् ब्राडले ने अपनी पत्रिका के सम्पादन में सहयोग का भार एनी वीसेन्ट को सौंप दिया। श्री ब्राडले के सुझाव के अनुसार एनी वीसेन्ट ने नारी मुक्ति के पक्ष में भाषण देना आरम्भ किया। उनके भाषण में अकाट्य तर्क होते थे। भाषा में माधुर्य व लालित्य होता था। प्रत्येक भाषण में ओज व उत्साह होता था और भाषणकर्त्ता स्वयं आकर्षक आकृति का जब हो, तब श्रोताओं में रुचि स्वतः जागती थी। कुछ समय पश्चात् एनी वीसेन्ट एक अच्छे भाषणकर्त्ताओं में गिनी जाने लगीं। उनके भाषणों के मुख्य विषय स्त्री अधिकार, धर्म, वैवाहिक सम्बन्ध और फ्रांस की क्रान्ति हुआ करते थे। भाषणों के साथ-साथ उन्होंने पुस्तकें लिखना भी आरम्भ कर दिया। कुछ पुस्तकों में तो उनके भाषण ही होते थे और ऐसी पुस्तकें जनता में खूब बिकती थीं। वह अपने भाषणों और लेखों में शरीर के साथ आत्मा की स्वतन्त्रता की आवश्यकता पर ज़ोर देती थी। जीवन में धर्म के स्थान पर जीवन की वैज्ञानिक प्रणाली का तर्क प्रस्तुत करती थीं।

इन्हीं दिनों उनकी परिचय परिधि का विस्तार हुआ। अंग्रेजी के प्रसिद्ध आलोचक, नाटककार और उपन्यास लेखक जार्ज बनार्ड शॉ, ग्राहम वेल्स और ब्लैंड आदि से उनकी जान पहचान बहुत शीघ्र ही मित्रता में बदल गयी…मजदूरों की दरिद्र दशा के कल्याण के लिए आन्दोलनों में उत्साह के साथ भाग लिया करती थीं। उन्होंने फ्रेबियन सोसाइटी की सदस्यता स्वीकार कर ली थी। फ़ेबियन सोसाइटी की स्थापना श्रमिक आन्दोलन के आधार पर इंग्लैण्ड में 1840 में की गयी थी। वह एक समाजवादी संस्था थी। 1906 में फ़ेबियन विचारधारा पर आधारित लेबर पार्टी की बुनियाद डाली गयी थी। पं. जवाहरलाल नेहरू काफ़ी प्रभावित थे।

1889 में उनके जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन आया। श्रीमती पी. ब्लेवट्स्की की भेंट से एनी वीसेन्ट के मन-प्राण में चिंतनीय मोड़ उत्पन्न हुआ। श्रीमती ब्लेवट्स्की थियोसोफिकल विचारधारा की प्रणेतास्वरूप श्रीमती एनी वीसेन्ट के जीवन में अवतरित हुई थीं। उनके साथ भेंट के उपरान्त एनी वीसेन्ट स्वतः उनसे मिलने लगीं। थियोसाफी दर्शन का अध्ययन करने लगीं और कुछ समय के उपरान्त एनी वीसेन्ट थियोसाफिकल विचारधारा की कट्टर पक्षघर हो गयीं और थियेसाफिस्ट हो गयीं।
उसके पश्चात भारत की थियोसाफिकल सोसाइटी के निमन्त्रण पर उन्हीं की धारणा के अनुसार भारत की पवित्र भूमि पर पदार्पण किया। भारत में रहकर वे हिन्दू दर्शन एवं तत्त्व ज्ञान से गंभीर रूप से प्रभावित हुई। भारत आकर कुछ दिन यह मद्रास में रहकर काशी चली गयीं। वहाँ उन्होंने हिन्दू दर्शन का अध्ययन किया। हिन्दू दर्शन तो उन्हें ज्ञान एवं अध्यात्म का असीमित गहरा सागर लगा। इसमें जितना कोई नीचे जाएगा उतना ही भण्डार उसे अभिभूत करता चला जाएगा। उन्होंने भारत दर्शन किया। विभिन्न प्राचीन ग्रन्थों एवं अभिलेखों का अध्ययन किया।

हिन्दू धर्म ही नहीं, उन्होंने बौद्ध, जैन, इस्लाम, ज़रदुश्त और सिख धर्मों का भी अध्ययन किया। 1901 में थियोसाफिकल सोसाइटी की पच्चीसवीं वर्षगाँठ के अवसर पर प्रायः सभी धर्मों की एकता एवं समन्वय पर अद्वितीय अध्ययन के आधार पर भाषण देना प्रारम्भ किया। अधिकतर सभी धर्मों के मूल लक्ष्य की समानता तथा एकता पर जोर देते हुए कहा, “पहुँचना तो सभी को एक ही लक्ष्य पर…चाहे राहें भिन्न भले ही हों…. फिर यह आपसी बैर, ज़ोर-ज़बरदस्ती और लड़ाई-झगड़े क्यों?” उनके ओजस्वी भाषण मात्र इसी विचारधारा का प्रतिपादन करते थे। उनके भाषणों से विशेषकर शिक्षित और स्वतन्त्र व खुले मस्तिष्क के लोगों में आकर्षण उत्पन्न हुआ। स्थान-स्थान पर सभ्य समाज के मध्य उनके भाषण होते थे और सभी उनके विचारों से सहमत हो जाते थे। थोड़े दिनों में, भारत में अन्य सुधारवादी आन्दोलनों की भाँति थियोसाफी की विचारधारा भी सशक्त ढंग से जड़ पकड़ने लगी। वास्तव में एनी वीसेन्ट के धारा प्रवाह होने वाले भाषणों से थियोसाफी का प्रचार बहुत व्यापक ढंग से हुआ। एनी वीसेन्ट महात्मा गाँधी व देश के अन्य नेताओं से मिलीं और पारस्परिक प्रभाव का आदान-प्रदान हुआ। धर्म को उन्होंने सार्वभौम माना। उनके अनुसार धर्मों में चलने वाले रीति-रिवाजों और पाखण्डों को अनावश्यक समझा, कबीर की भाँति ।

शिक्षा की दशा सुधारने पर उनके प्रयास असाधारण हैं। उनके विचारानुसार शिक्षा स्वयंसेवी होनी चाहिए-सत्ता के अंकुश से बिलकुल मुक्त। उन्होंने प्राचीन शिक्षा प्रणाली का अध्ययन किया और बताया शिक्षा अपने आप में आध्यात्मिक कार्य की भाँति पवित्र होनी चाहिए। पढ़ना और पढ़ाना दोनों श्रेष्ठ सामाजिक कर्त्तव्य माने जाने चाहिए।

उन्होंने स्वयं पढ़ाना आरम्भ किया। काशी के एक छोटे-से घर में उन्होंने कक्षाएँ आरम्भ कीं। यह दिन एनी वीसेन्ट और भारतीय शिक्षा के इतिहास में अविस्मरणीय दिन माना जाएगा – 7 जुलाई, 1898। एक कोमल पौधे के रूप में अंकुरित एनी वीसेन्ट द्वारा संचालित दो कक्षाओं का विद्यालय अपने प्रयासों से विकसित होते-होते कालान्तर में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सम्बद्ध किया गया। उसके विकास के लिए तत्कालीन समृद्ध देशभक्त डॉक्टर भगवान दास, आर्थर रिचर्ड, उपेन्द्र नाथ, ज्ञानेन्द्र नाथ चक्रवर्ती इत्यादि विद्वानों के निरन्तर प्रयासों को श्रेय दिया गया। परन्तु उसकी व्यवस्था केप्रति अंग्रेज़ी सरकार के नकारात्मक रवैये के कारण वह वृक्ष सूखने लगा। फिर भी, जब एनी वीसेन्ट 1917 में कांग्रेस की अध्यक्ष हुई तब उन्होंने प्रयास किया। उस समय उन्होंने देशव्यापी शिक्षा योजना आरम्भ की थी। पुनः

एनी वीसेन्ट का कांग्रेस में प्रादुर्भाव ऐसे समय हुआ जब देश में ‘होमरूल’ की चहल-पहल चल रही थी। आयरलैण्ड में होमरूल आन्दोलन की भाँति भारत में भी होमलरूल की माँग को आन्दोलन का रूप दिया जा रहा था। 1917 में एनी वीसेन्ट को कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया था। इस कारण उनकी भी सक्रियता स्पष्ट रूप से बढ़ गयी थी। उन्हीं दिनों 1914 में बाल गंगाधर तिलक माण्डले (वर्मा) की कारा से मुक्त होकर आ गए थे और वास्तविक रूप से वह लोकमान्य हो गए थे। उन्हीं दिनों यूरोप में महायुद्ध फूट पड़ा था और इंग्लैण्ड पूरी प्रकार से उसमें फँस चुका था। भारत ने युद्ध में समर्थन इसी शर्त पर देना स्वीकार किया था कि अंग्रेज़ युद्ध के पश्चात् देश को स्वतन्त्रता की ओर बढ़ाने में व्यावहारिक और राजनीतिक रूप से सहयोग देगा…इसी आश्वासन के अन्तर्गत कांग्रेस की ओर से होमरूल की माँग उठी थी ।

थियोसाफिकल आन्दोलन में सक्रियता के कारण एनी वीसेन्ट सारे संसार में पहचानी जाने लगी थीं। उनके भावना एवं लेख सभी देशों में बड़ी रुचि और इज़्ज़त के साथ पढ़े जाते थे। एक प्रकार से एनी वीसेन्ट थियोसाफिकल दर्शन एवं विचार धारा की पर्याय मानी जाने लगी थीं। भारत में भी थियोसाफी के नाम पर श्रीमती एनी वीसेन्ट को ही जाना जाता था। उसकी वास्तविक संस्थापिका श्रीमती एच.पी. ब्लेवट्स्की से तो कम ही परिचित थे और उनकी पुस्तक ‘द सीक्रेट डॉक्ट्रीन’ (गुप्त सिद्वान्त) तो बिरलों ने ही पढ़ी होगी। थियोसाफी भारत में उसके उद्देश्यों के कारण अधिक लोकप्रिय हो गयी। विश्व बन्धुत्व में विश्वास के साथ आर्य व अन्य पूर्वी धर्मो, भाषा, विज्ञान के अध्ययन को प्रोत्साहित करना है।

भारत की दुर्दशा, पिछड़ापन, कूपमण्डूकता, निरक्षरता से द्रवित हो गई थीं। उस पर अंग्रेज़ सरकार द्वारा शोषण और मनमाना अत्याचार (उनके कांग्रेस का अध्यक्ष चुने जाने के दो वर्ष बाद 1919 में जलियाँवाला बाग काण्ड ने तो उन्हें भी हिलाकर रख दिया था) देखकर ही एनी वीसेन्ट कांग्रेस से जुड़ी थीं। एनी वीसेन्ट भारत में रहकर भारत की प्राचीन सभ्यता, संस्कृति और उसके लगभग भुला दिए गए मूल्यों को पुनः स्थापित करना चाहती थीं और भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में अपना भी भरसक योगदान देना चाहती थीं। स्वतन्त्रता संग्राम के कारण

भारतीयों के मन में अंग्रेज़ों के प्रति रोग और वैमनस्य की भावना हटाकर दोनों देशों के बीच प्यार और सद्भावना के फूल खिलाना चाहती थीं। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत ने राष्ट्रकुल की सदस्यता स्वीकार करके एनी वीसेन्ट के स्वप्न को साकार किया है। आज दोनों देशों की जनता पुरानी बातों को भुलाकर एक अच्छे-मित्र का व्यवहार करती है।
होमरूल से उनका तात्पर्य था स्वराज्य, स्वशासन उन्होंने होमरूल की व्याख्या करते हुए अपने साप्ताहिक में लिखा था कि उनका लक्ष्य ग्राम परिषदों, जिला बोर्डों, नगरपालिकाओं, प्रान्तीय विधान सभाओं के माध्यम से राष्ट्रीय संसद का गठन करना है। ब्रिटिश साम्राज्य की संसद में ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा शासित उपनिवेशों की भाँति भारत का प्रतिनिधित्व हो…एक प्रकार से वह आयरलैण्ड के स्वतन्त्रता संग्राम से प्रेरणा लेकर उनके ‘होमरूल’ का ही प्रतिपादन करना चाहती थीं।

यद्यपि होमरूल का आन्दोलन वैधानिक व शान्तिपूर्ण था फिर भी जनता के उत्साह को देखकर सरकार ने आन्दोलन उग्र हो जाने से पहले ही सतर्कता के तौर कुछ कार्यवाही कर दी… उसने एनी वीसेन्ट और लोकमान्य तिलक की गतिविधियों पर अंकुश लगा दिया। तिलक से सरकार ने एक साल शान्त रहने और भारी राशि की ज़मानत माँग ली। तिलक ने सरकार के उस आदेश के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील कर दी और न्यायालय के आदेशानुसार सरकार को अपने आदेश वापस लेने पड़ गए। एनी वीसेन्ट से उनके दोनों पत्र ‘कामन व्हील’ और ‘न्यू इण्डिया’ से बीस हजार रुपयों की जमानत माँगी और उनको तथा उनके दो सहयोगियों-जी. एस. अरेन्डेल और पी. जी. को नज़रबन्द कर दिया… सरकार का अनुमान था कि उस नज़रबन्दी से जनता रुक जाएगी, परन्तु आन्दोलन भड़क उठा। सभाएँ होने लगीं। पुलिस द्वारा गिरफ्तारियाँ शुरू हो गईं। सरकार की उस कार्यवाही का उलटा प्रभाव पड़ा। जनता होमरूल के आन्दोलन में भाग लेने लगेगी… धीरे-धीरे सत्याग्रह आरम्भ हो गया। तिलक सत्याग्रह करने में सबसे आगे तैयार थे।

26 अगस्त, 1917 को मांटेग्यू भारत मन्त्री बनाए गए। भारत में उन्हें शुभचिन्तक समझा जाता था। मोंटेग्यू के मतानुसार भारत में भारतीय की सहमति से शासन चलना चाहिए और 26 अगस्त, 1917 को ब्रिटिश सरकार की ओर अपना मत स्पष्ट किया और कहा कि शासन में भारतीयों की भागीदारी बढ़े, एक उत्तरदायी शासन प्रणाली का विकास हो और भारत ब्रिटिश साम्राज्य से पृथक् नहीं माना जाएगा। घोषणा के अन्तिम अंश के बावजूद स्वागत किया गया। नवम्बर, 1917 में मांटेग्यू भारत आए और भारतीय नेताओं के साथ विचार-विमर्श किया। श्रीमती एनी वीसेन्ट की नज़रबन्दी समाप्त कर दी गयी।

उसी समय भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के मंच पर अफ्रीका से कुछ क्रान्तिकारी पराक्रम करके लौटा एक ऐसा पात्र जिसने अखिल भारत की गति ही बदल दी। उसने विश्व के समक्ष बिलकुल नया और क्रान्तिकारी सिद्धान्त के रूप में एक विचित्र हाथियार प्रस्तुत किया-अहिंता । दक्षिण अफ्रीका में उन्हें उसी सिद्धान्त के माध्यम से भारी सफलता मिली थी और उसी सिद्धान्त को भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के लिए एक ऐसे साम्राज्य के विरुद्ध उपयोग करना चाहते थे जिसमें सूर्यास्त नहीं होता था। मोहनदास करमचन्द गाँधी का प्रभाव बहुत शीघ्र ही भारतीय नेतृत्व पर पड़गया। गोपाल कृष्ण गोखले इत्यादि शीर्ष नेता स्वतः सिमट गए । यद्यपि गाँधी जी उनको ही अपना गुरु मानते थे। गोखले की सलाह के अनुसार गाँधी जी ने दो वर्ष तक भारत भ्रमण किया और देश के प्रत्येक पक्ष का अध्ययन किया।

गाँधी जी का ब्रिटिश राज्य से सीधा तनाव नहीं था उन्हें तो ‘केसर-ए-हिन्द’ की मानद उपाधि दी गयी थी। परन्तु रौलट एक्ट और 1919 अप्रैल के जलियाँवाला बाग के क्रूर हत्याकाण्ड के कारण भारतीय मानस का तख्ता पलट दिया। गाँधी जी ने अपनी उपाधि त्याग दी… रवीन्द्रनाथ टैगोर ने द्रवित होकर ‘सर’ की उपाधि त्याग दी…सारे देश में निन्दा और विरोध का धुआँ छा गया। एनी वीसेन्ट भी शान्त नहीं बैठीं। वह कांग्रेस से अलग हो गयीं क्योंकि कांग्रेस ने गाँधी जी द्वारा चलाया असहयोग आन्दोलन स्वीकार कर लिया था जो एनी वीसेन्ट को उचित नहीं लगा। उनके अनुसार असहयोग आन्दोलन कानून का उल्लघंन था।

कांग्रेस से अलग होकर स्वतन्त्रता की लड़ाई एनी वीसेन्ट ने अपने तरीके से आगे बढ़ाई। परन्तु गाँधी की आँधी के प्रचण्ड वेग से जो भी अलग हुआ वह देश के राजनीतिक जीवन में अधिक देर ठहर नहीं पाया। वैसे एनी वीसेन्ट ने सर तेज बहादुर सप्रू के साथ भारतीय संविधान की रूपरेखा बनाई थी जो भारतीय जीवन मूल्यों का प्रतिबिम्ब था।

1931 में स्वास्थ्य गिर जाने के कारण ये अत्यन्त कमज़ोर हो गई थीं और 20 सितम्बर, 1933 को वह मशाल बुझ गयी जिसने भारत व सारे विश्व को आलोकित किया था।

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