कल्पना दत्त || KALPANA DATT

कल्पना दत्त

भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के सशस्त्र क्रान्ति के विल्पवी इतिहास में चटगाँव के सरकारी शस्त्रागार के लूटे जाने की रोमांचक घटना ब्रिटिश साम्राज्य की आँख में किरकिरी खटकती रही। सरकार के सारे सुरक्षा प्रबन्ध व सतर्कता पर पानी फेर दिया था क्रान्तिकारियों ने; जब 18 अप्रैल, 1930 को कल्पना दत्त तथा उनके साथी क्रान्तिकारियों ने चटगाँव के सरकारी शस्त्रागार को लूट कर एक कीर्ति स्तंभ गाड़ दिया था।

1922 का असहयोग आन्दोलन को चौरा चौरी की अशोभनीय घटना के कारण गाँधी जी के द्वारा वापस लेने के कारण देश के युवा वर्ग का क्रिया चक्र चलते-चलते अचानक रुक गया और निराशा व कुण्ठा का घना अँधेरा छा गया। देश के नौजवानों को तो आज़ादी के लक्ष्य तक पहुँचना आवश्यक था। असहयोग आन्दोलन के वापस लेने से देश में एक खालीपन दिखने लगा। उसी खालीपन को दूर करने के लिए क्रान्तिकारियों ने पुनः सक्रियता अपना ली। अंग्रेज़ों को देश से खदेड़ने के लिए क्रान्तिकारी साथी बम-पिस्तौल आदि बनाने व एकत्रित करने लगे।

अप्रैल, 1930 पं. जवाहरलाल नेहरू की गिरफ्तारी के विरोध में हड़तालें की गयीं। सरकार के कड़े व सतर्कतापूर्ण प्रबन्ध के बावजूद हड़तालों की सफलता के कारण बौखला गयी और चौकन्नी हो गयी। फिर भी 18 अप्रैल, 1930 को चटगाँव का सरकारी शस्त्रागारलूट लिया गया। हड़ताल की सफलता के पश्चात् यह घटना सरकार के गाल पर दूसरा तमाचा था। उस क्रान्तिकारी साहसपूर्ण कीर्तिमान के पीछे कल्पना दत्त का सक्रिय हाथ

था। शस्त्रागार लूट लेने के पश्चात् कल्पना दत्त व उनके सक्रिय क्रान्तिकारी साथियों का तीसरा कीर्तिमान स्थापित करने का इरादा था। अपने साथी क्रान्तिकारियों रामकृष्ण और दिनेश गुप्त को फाँसी के फन्दे से छुड़ाने के लिए जेल को डायनामाइट से उड़ा देने की योजना बनायी। लेकिन इस गुप्त योजना की सूचना पुलिस को मिल गयी और योजना कार्यान्वित नहीं की जा सकी।

साथ में कल्पना दत्त को 17 सितम्बर, 1932 को चटगाँव में पहाड़ी तल्ला के समीप पकड़ लिया गया जबकि वह पुरुष वेश में चटगाँव में परिस्थितियों का पत्ता लगाने रात में घूम रही थीं। इनकी गिरफ्तारी के सात दिन बाद एक यूरोपियन क्लब पर आक्रमण करते समय कल्पना दत्त की क्रान्तिकारी महिला मित्र प्रीति लता शहीद हो गयी। उसके पश्चात् गणेश घोष और लोकनाथ बल आदि को गिरफ्तार कर लिया गया। चटगाँव शस्त्रागार से लूटे हुए हथियारों को छुपाने और लड़कियों के क्रान्ति दल में भर्ती होकर क्रान्तिकारियों को उत्साहित करने अथवा अंग्रेज़ सरकार के विरुद्ध भड़काने के आरोप में उनके विरुद्ध मुकदमा चलाया गया। साक्ष्यों की अनुपस्थिति में कानूनी झंझटों से बच गयी कल्पना दत्त, फिर भी उन्हें अपने निवास में नज़रबन्द कर दिया गया।

नज़रबन्दी में पड़ा रहना, हर समय कुछ-न-कुछ करती रहने वाली कल्पना दत्त थोड़े ही दिन में ऊब गयी। बाहर सूर्यसेन उसे नज़रबन्द कैद से मुक्ति दिलाने की जुगत में लगे थे और अवसर मिलते ही कल्पना दत्त निकलने में सफल हो गयी। फिर खेल शुरू हुआ लुका-छुपी का कल्पना दत्त मास्टर सूर्यसेन दा तथा अन्य क्रान्तिकारी साथियों के साथ पुलिस से बचती फिर रही थी, परन्तु 16 फरवरी, 1938 की रात में जब वह भोजन करके घर से एक काम के लिए बाहर निकले थे, एक गद्दार मुखबिर द्वारा सूचना के आधार पर पुलिस से मुठभेड़ हो गयी। कुछ देर तक दोनों ओर से गोलियाँ चलती रहीं और अन्त में सूर्यसेन दा गिरफ्तार कर लिए गए और कल्पना बच निकली।

कल्पना वहाँ से भागती रही…भागती रही। तेज वर्षा में वह बिलकुल भीग गयी थी फिर भी वह भागती रही। अन्त में वह एक गाँव में पहुँच सकी। पुलिस शिकारी कुत्तों की भाँति कल्पना दत्त के पीछे पड़ी हुई थी- मई 1933 में एक सूचना के आधार पर पुलिस ने एक घर को घेर लिया। उसमें कल्पना ठहरी हुई थी… रात भर सब शान्त रहा। कल्पना रात के अंधेरे में निकल भागना चाहती थी। परन्तु पुलिस की चौकसी तेज थी। पुलिस उस ‘लक्ष्य’ को किसी भी दशा में गँवाना नहीं चाहती थी। दिन निकलते ही संघर्ष आरम्भ हो गया। गोलियाँ दोनों ओर चलने लगीं।पुलिस की एक गोली से कल्पना दत्त का एक साथी घायल हो गया। कल्पना के एक हाथ पर भी एक गोली लग गयी। मुकाबला कब तक चलता ? अन्त में कल्पना दत्त को गिरफ्तार कर लिया गया।

12 फरवरी, 1994 को चटगाँव शस्त्रागार काण्ड के अभियुक्त दस्तीदार तथा सूर्यसेन दा को फाँसी दे दी गयी और कल्पना दत्त को आजीवन कारावास । कल्पना दत्त अपने शिक्षक दस्तीदार तथा साथी सूर्यसेन दा को फाँसी दिए जाने पर टूट गयीं वह उस दिन बहुत रोई थीं… कारावास उनके लिए अभिशाप था अथवा वरदान कल्पना दत्त समझ नहीं पाई फिर वह अकेली पड़ गयी थीं चह निश्चित था अपने आत्मीय जन के न रहने पर उन्हें जेल में रखने या बाहर छोड़ देने में कोई अन्तर नहीं था… एक फीकी मुस्कान उनके निर्जीव चेहरे पर चिपक गयी। वह अपने आप जाकर जेलथान में जा बैठीं ।

कल्पना दत्त का जन्म 27 जुलाई, 1914 को चटगाँव में हुआ जो आजकल बंगलादेश में स्थित है। पिता श्री विनोद बिहारी दत्त छोटा-मोटा व्यापार करते थे और परिवार की गाड़ी चलाते थे। उनकी पत्नी श्रीमती शोभना देवी धार्मिक प्रवृत्ति की घर गृहस्थी वाली व्यस्त महिला थीं। जैसा नाम दिया था माता-पिता ने वैसी ही कल्पना शक्ति भी मिल गयी थी विधाता से बचपन से उन्हें ऐतिहासिक महापुरुषों व महिलाओं की जीवनियाँ जानने अथवा पढ़ने का शौक था। उन्हीं कहानियों में वह रम जाती थीं और कल्पना के पंख लगाकर वैसा ही साहसिक पात्र में स्वयं को समाविष्ट कर देती थी। उन वीर महिलाओं व पुरुषों की भाँति अपना जीवन ढालने के लिए कल्पना दत्त अपने शरीर की पुष्टता की ओर विशेष ध्यान देने लगी थीं। व्यायाम नित करती थीं। तैराकी सीख ली थी दौड़ने का भी अभ्यास करती थीं और पिस्तौल चलाने के प्रशिक्षण के लिए किसी योग्य निशानेबाज़ की तलाश थी।

दत्त पर परिवारिक पृष्ठभूमि का प्रभाव भी पड़ा था। उनके चाचाओं में क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रति सम्पूर्ण समर्थन चल रहा था। वे क्रान्ति से सम्बन्धित पुस्तकें और अन्य सामग्री लाकर कल्पना को पढ़ने के लिए देते थे। अपने स्कूल में भी कल्पना विभिन्न प्रकार की दौड़-धूप वाली गतिविधियों में भाग लेती थीं। कई बार उन्हें पुरस्कार भी मिल चुका था। मात्र 14 वर्ष की आयु में कल्पना ने चटगाँव के एक विद्यार्थी सम्मेलन में बहुत ही उग्र भाषण दिया था, जिसे सुनकर प्रायः सभी श्रोताओं ने आश्चर्य से दाँतों तले उँगली दबा ली थी। कल्पना के भाषण की शैली और ओजपूर्ण उग्रता से ही उसके भीतर से एक अपूर्व क्रान्ति ज्वाला झाँकने लगी थी। एक बार उन्होंने सिंह गर्जना की थी, “यदि हमें संसार में गर्व के साथ जीना है तो हमें अपने माथे से गुलामी का कलंक मिटाना पड़ेगा…और उसके लिए हमें

हर प्रकार की कुर्बानी के लिए तैयार रहना पड़ेगा।” 1930 के आसपास चटगाँव में क्रान्तिकारी वातावरण बनने लगा था। कल्पनादत्त तब मात्र सोलह वर्ष की युवती थीं। देश के लिए कुछ कर गुज़रने के लिए • उनका उत्साही मन तड़प रहा था…तभी उनके चाचा ने आकर उन्हें बताया, “लो क्रान्ति तुम्हारे द्वार पर आ गयी है…” कल्पना सुनकर सुखद आश्चर्य से चौंक उठी। उनके मुँह से निकला—’कहाँ’? उत्तर में उनके चाचा ने बताया…”अपने सूर्यसेन दा हैं न, उनका ही क्रान्तिकारी दल कुछ करेगा…तुम देखती जाओ।”

“देखने से काम नहीं चलेगा काकू…अब हमें भी करना होगा…” फिर उन्हें अपने प्रशिक्षक दस्तीदार का मार्गदर्शन मिलने लगा। उनके ही मार्गदर्शन के तले लाठी भाँजने, तलवार व खंजर चलाने व पिस्तौल का निशाना साधने का गहन प्रशिक्षण लेना आरम्भ कर दिया। कुछ दिन के निरन्तर व गम्भीर प्रशिक्षण के फलस्वरूप कल्पना दत्त का निशाना पूरे दल में विश्वसनीय माना जाने लगा। लाठी के बलबूते वह अच्छे-अच्छों के छक्के छुड़ा देती थीं। तलवार के वार की कभी नौबत नहीं आई थी वरन् उसमें भी वह दक्षता का प्रदर्शन करने के लिए हर समय तैयार रहती थीं। अपने प्रशिक्षक श्री तारकेश्वर दस्तीदार की ही सिफारिश पर कल्पना दत्त को दल में प्रवेश प्राप्त हो गया था। क्रान्तिकारी दल की सदस्यता को कल्पना दत्त वरदान समझती थीं और गर्व की बात के साथ ही सदस्यता की गरिमा व दायित्व मानती थीं।

लगभग चार वर्ष क्रान्ति दल में सक्रियता के साथ कार्य करती रहीं जिसमें 18 अप्रैल, 1930 को चटगाँव के सरकारी शस्त्रागर को लूटकर दल ने एक कीर्तिमान स्थापित किया था। 12 फरवरी, 1934 को शस्त्रागार काण्ड के मुकदमे में दस्तीदार व सूर्यसेन को फाँसी और कल्पना दत्त को आजीवन कारावास हो गया।

जेल में कल्पना दत्त मौन बैठने वाली महिला नहीं थीं। मिदनापुर जेल में गाँधी जी से मिल पाने की अनुमति दे दी गयी। यद्यपि गाँधी जी कल्पना दत्त से उनकी हिंसक क्रान्तिकारी गतिविधियों को लेकर सहमत नहीं थे फिर भी उनकी मुक्ति के लिए गाँधी जी ने प्रयत्न किया था। 1937 में जब प्रान्तीय स्वायत्तता के अन्तर्गत स्वदेशी शासन आरम्भ हुआ तब गाँधी जी, गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर तथा सी.एफ. एण्ड्रयूज़ के प्रयासों के कारण कल्पना दत्त को एक मई, 1939 को मुक्त कर दिया गया।

जेल से मुक्त होने के बाद कल्पना दत्त ने पुनः पढ़ना आरम्भ किया और उन्होंने एम.ए. पास किया तब वह साम्यवादी पार्टी की सदस्य के रूप में मजदूर संघ का कार्य देखने लगीं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सरकार कल्पना दत्त के पूर्व इतिहास को देखते हुए उन पर विशेष सतर्क रहती थी। कलकत्ता के अकाल के समय क्रान्ति की चिंगारी – कल्पना दत्त कब ज्वाला बन जाए और विस्फोटक स्थिति उत्पन्न कर दे…सरकार ने इसी भय के कारण 24 घंटे में कल्पना दत्त को कलकत्ता छोड़ देने का आदेश जारी कर दिया था।

कलकत्ता छोड़कर कलपना दत्त अपने गाँव चटगाँव चली गयीं। चटगाँव में कल्पना दत्त निष्क्रिय नहीं बैठीं। क्रान्तिकारियों में सूचना एवं प्रचारसामग्री वितरण व्यवस्था में लग गयीं। इन्हीं गतिविधियों को देखते हुए सरकार उन पर सतर्कता बरतने लगी। इसी कारण वह 1942 के ‘भारत छोड़ो’ देशव्यापी आन्दोलन में भाग नहीं ले पाई।

साम्यवादी दल में काम करने वाले दिनों से पार्टी के प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता पूर्णचन्द जोशी (पी. सी. जोशी) से भेंट हो गयी थी। समय-समय पर पार्टी के प्रोग्राम के अन्तर्गत कल्पना दत्त जोशी जी से मिलती रहती थीं। शनैः शनैः दोनों में कोमल भावनाएँ अंगड़ाई लेने लगीं। अन्ततः 4 अगस्त, 1948 को दोनों विवाह सूत्र में आबद्ध में हो गए।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् कल्पना दत्त जोशी कलकत्ता चली गयीं और अध्यापन कार्य में व्यस्त हो गयीं कुछ समय तक कलकत्ता रहकर दिल्ली आ गयीं। जहाँ वह भारत सोवियत सांस्कृतिक सोसाइटी के काम में व्यस्त हो गयीं। 1975 के महिला वर्ष’ में उनको सम्मानित किया गया और स्वतन्त्रता सेनानी

को दी जाने वाली पेंशन दुगनी कर दी गयी। 1979 में उन्हें पूना में ‘वीर महिला’

की उपाधि से अलंकृत किया गया।।

श्रीमती कल्पना दत्त जोशी अपने क्रान्तिकारी इतिहास की प्रत्येक रोमांचकारी

घटना की स्मृति अपने आकुल अन्तर में सैंजोए कुछ-न-कुछ रचनात्मक गतिविधियों

में लगी रहती हैं। देश को उनके अनुभवों से लाभ उठना चाहिए क्योंकि अब ऐसे

चमत्कारी व्यक्तियों की गंगोत्री लगभग सूखती जा रही है।

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